जैसा की हम सभी जानते है
की 1946 ईस्वी में कैबिनेट मिशन के सलाह पर भारत में एक संविधान सभा का गठन किया
गया । 9 दिसंबर 1946 ईस्वी को संविधान सभा की पहली बैठक सचिदानंद सिन्हा की अस्थाई
अध्यक्षता में हुई। 11 दिसंबर 1946 ईस्वी को डॉ राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के
स्थाई अध्यक्ष बनाए गए । 13 दिसंबर 1946 ईस्वी को जवाहर लाल नेहरू द्वारा संविधान
सभा के लिए उद्देश्य प्रस्ताव पास किया गया इसी प्रस्ताव बाद के दिनों में
प्रस्तावना कहा गया तथा इसमें कुछ सामान्य संसोधन भी हुए ।
प्रस्तावना की विशेषता
प्रस्तावना की शुरुआत “हम भारत के लोग
से...” होती है । इसका अर्थ है की संविधान को उसकी शक्ति भारत की जनता से मिल रही
है ।
प्रस्तावना में प्रयुक्त प्रमुख
शब्दों
के अर्थ
1.
सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न- इसका अर्थ यह है की भारत
अपने अंदरूनी तथा बाह्य मामले पर अपने विवेक से फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है । भारत
किसी बाह्य संस्था तथा अन्य देशों के दवाब में कोई कार्य नहीं करेगा ।
2.
पंथनिरपेक्ष- भारत का संविधान किसी भी पंथ को नहीं मानता
है तथा किसी भी पंथ को मानने की वजह से नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा।
3.
लोकतंत्रात्मक- भारत की शासन व्यवस्था भारत के नागरिकों
द्वारा चुनी गई जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित होगी ।
4.
गणराज्य- भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन होगा।आनुवंशिक
आधार पर कोई भी नागरिक भारत का राष्ट्रपति नहीं बन सकता है । उदाहरण- भारत गणराज्य
है किन्तु ब्रिटेन नहीं क्योंकि ब्रिटेन का सर्वोच्च पद वंशानुगत है जबकि भारत में
राष्ट्रपति का चुनाव होता है।
प्रस्तावना में हुए संसोधन
42वाँ संविधान संसोधन 1976- इस संसोधन के
द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, पंथ-निरपेक्षता शब्द को जोड़ा गया तथा “राष्ट्र की
एकता” शब्द को “राष्ट्र की एकता और अखंडता” में परिवर्तित कर दिया गया । इसके बाद
प्रस्तावना में कोई संसोधन नहीं हुआ ।
प्रस्तावना पर न्यायलयों के प्रमुख विचार
बेरुबारी संघवाद1960- इस फैसले में
सर्वोच्च न्यायलय ने प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना था ।
केशवनन्द भारती बनाम
केरल राज्य 1973- प्रस्तावना संविधान का भाग है
अन्य तथ्य
प्रस्तावना को सर्वप्रथम अमेरिका के संविधान में
सम्मिलित किया गया ।
भारतीय संविधान में प्रस्तावना की भाषा को
आस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया ।
प्रस्तावना में भारत शब्द का प्रयोग दो बार किया
गया है ।

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